जिस शादी की बारात में बाजे, खैल, तमाशे वगैरह हों तो आलिमे दीन को बारात के साथ जाना मुतलकन मना है। 93
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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_
*✍️ पोस्ट न. 093*
_*📜मसअलाः- जिस शादी की बारात में बाजे, खैल, तमाशे वगैरह हों तो आलिमे दीन को बारात के साथ जाना मुतलकन मना है। हरगिज़ शिरकत न करे, बाकी आम आदमी कि वह बाजे वगैरह की तरफ बिल्कुल तवज्जेह न करे बल्कि महज़ सुले रहमी या दोस्ती की रिआयत के सबब बारात में शरीक हो कर जाय तो जा सकता है।*_
_*📜मसअलाः- दावत में बारात के घर जाना अगर बाजे वगैरह दूसरे मकान में हों तो हरज नहीं। अगर आलिम मुक़तदा के लिए तीन सूरतें हैं। अगर आलिम जानता है कि मेरे जाने से मुनकिरात बन्द हो जायेंगे और मेरे सामने न करेंगे तो जाना ज़रूरी है और अगर जानता है कि मेरी खातिर उन लोगों को इतनी अज़ीज़ है कि मैं शिरकत से इन्कार करूंगा तो व मजबूरन ममनूआत से बाज़ रहेंगे और मेरा शरीक न होना गवारा न करेंगे तो इस पर वाजिब है कि बेतर्के मुनकिरात शिरकत से इनकार कर दे अगर वे लोग इसके इन्कार पर मुनकिरात से बाज़ हैं तो दावत में जाना जरूरी है और अगर इनके इन्कार पर बाज़ न रहेंगे तो हरगिज़ न जाए और अगर ढोल, बाजे वगैरह उसी बारात के मकान में हों तो हरगिज़ न जाएं और अगर जाने के बाद शुरू हो तो फ़ौरन उठ जाएं।*_
_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 90/91*_
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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