खाने का बयान 80
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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_
*✍️ पोस्ट न. 080*
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*
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_*खाने का बयान*_
__*📜मसअ्लाः- सेर होकर खाना ताकि नवाफ़िल कसरत से पढ़ सकेगा और पढ़ने-पढ़ाने में कमज़ोरी पैदा न होगी मुसतहब और सेरी से ज़्यादा खाना मगर इतना ज़्यादा नहीं कि शिकम खराब हो जाए मकरूह है। इबादत गुज़ार आदमी को इख्तियार है कि बक़दरे मुबाह तनावुल करे या बक़दरे मनदूब मगर उसे यह नियत करना चाहिए कि इसलिए खाता हूं कि इबादत की कुव्वत पैदा होगी, इस नियत से खाना एक किस्म की ताअ़त है और खाने से मक़सद तलज्जुज़ व तनउम न हो कि यह बुरी सिफ़त है।*_
_*📜मसअ्लाः- रियाज़त व मुजाहिदा में इतना कम खाना कि इबादते मफ़रूज़ा की अदायगी में कमज़ोरी लाहिक हो जाएगी मसलन इतनी कमज़ोरी लाहिक हो जाएगी कि खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकेगा, यह नाजाइज़ है और अगर इस हद की कमज़ोरी पैदा न हो तो हरज नहीं।*_
_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 82*_
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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