दोस्त व अहबाब या दीनी भाई की ज़्याफ़त करना 85

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 085*


_*💫दोस्त व अहबाब या दीनी भाई की ज़्याफ़त करना और उसके साथ खाना खाना भारी मिक़दार में सदक़ा करने से अफ़ज़ल है । नीज़ खाने में बरकत होती है , क़यामत के दिन उस खाने का हिसाब नहीं होगा और अल्लाह तआला खिलाने वालों के लिए फल का दरवाज़ा कुशादा फ़रमा देता है । लिहाज़ा हमें चाहिए कि मोमिन भाईयों को खिलाएं और उनके साथ खूद भी खाएं ।*_ 

_*📚हदीस शरीफ़ में है कि तीन चीज़ों का बन्दे से हिसाब नहीं लिया जायगा एक तो वह चीज़ जो सहरी में खायेगा दूसरी जिससे रोज़ा इफ्तार परेगा तीसरा जो कुछ दोस्तों के साथ खायेगा हज़रत ह़सन बसरी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं बन्दा जो कुछ खाता पीता है और अपने माँ बाप को खिलाता है उसका हिसाब होगा और जो खाना दोस्तों के साथ खाता है उसका हिसाब न होगा । इसलिए बअज़ बुजुर्गाने दीन से मनकूल है कि वह मेहमान के सामने ज़्यादा से ज़्यादा खाना पेश करते थे ताकि जो खाना बच जाए उससे खुद खाएं और घर वालों को खिलाएं*_

_*✨बिलखुसूस भूकों को खिलाने में ज़्यादा फ़ज़ीलत व सवाब है । हदीस शरीफ़ में है कि हक़ तआला क़यामत के दिन फ़रमायगा " ऐ बनी आदम ( आदम की औलाद ) ! मैं भूका था और तूने मुझे खाना न दिया । " बन्दा अर्ज़ करेगा “ ऐ रब ! तू क्योंकर भूका होता ? तू तो सारे आलम का मालिक है , तुझको खाने पीने की कुछ हाजत नहीं । " इरशाद होगा “ तेरा भाई भूका था , अगर तू उसको खाना खिलाता तो गोया मुझको खिलाता । "*_

_*💫इससे मालूम हुआ कि भूकों को खाना खिलाना गोया रब को खिलाना है । दूसरी हदीस में है कि तुम में सब से बेहतर वह है जो खाना खिलाए ।*_

_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 84/85*_
                       
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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