तलाक़ की क़िस्में 71
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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_
*✍️ पोस्ट न. 071*
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*
_*✨तलाक़ की क़िस्में ✨*_
_*📖 मसअ्लाः- तलाक देना जाइज़ है मगर बेवजह शरई मकरूह व ममनू है और शरई वजह हो तो मुबाह बल्कि बअज़ सूरतों में मुस्तहब है । मसलन औरत अपने शौहर को या औरों को तकलीफ देती है या नमाज़ नहीं पढ़ती । हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्ह फ़रमाते कि बेनमाज़ी को तलाक दे दूं अगरचे उसका मेहर ज़िम्मे बाक़ी हो , इस हालत के साथ दरबारे खुदाबन्दी में मेरी पैशी हो तो यह इससे बेहतर है कि उसके साथ ज़िन्दगी बसर करूं । और बअज़ सूरतों में तलाक़ देना वाजिब है । मसलन शौहर नामर्द या हिजड़ा है या उस पर किसी ने जादू या अमल कर दिया है कि जिमाअ़् ( सोहबत ) करने पर कादिर नहीं और इसके इज़ाले की भी कोई सूरत नज़र नहीं आती तो इन सूरतों में तलाक़ न देना सख्त तकलीफ़ पहुंचाना है ।*_
_*📖 मसअलाः- हालते हैज़ में तलाक देना हराम व गुनाह है । अगर किसी ने तलाक दे दी तो ' रजअ़्त ' वाजिब है ।*_
_*📖 मसअलाः- माँ - बाप औरत को तलाक देने का हुक्म दें और न देने में इनकी ईज़ा व नाराज़गी हो तो तलाक़ देना वाजिब है , अगरचे औरत का कुसूर न हो।*_
_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 77*_
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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