तलाक़ का बयान 67

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 067*
 
                 *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*

                     _*✨तलाक़ का बयान ✨*_

_*💫 मतलब यह है कि अगर औरत में कोई कमी हो जिसकी बिना पर वह शौहर को पसंद न आये तो भी यह मुनासिब नहीं कि शौहर फौरन दिल बर्दाश्ता होकर तलाक देने पर आमादा हो जाए। बसा औकात ऐसा भी होता है कि औरत में इसके अलावा दीगर बहुत सी खूबियां होती हैं जो इज़दिवाजी ज़िन्दगी के लिए बड़ी अहमियत रखती हैं। लिहाजा यह बात शरीअत को बिल्कुल पसंद नहीं कि आदमी छोटी-छोटी बातों पर इज़दिवाजी तअल्लुकात ख़तम कर दे। तलाक तो बिल्कुल आखिरी रास्ता है जिसको बदरजए मजबूरी काम में लाना चाहिए। वह भी अगर ज़रूरत है तो एक ही तलाक़ दे ताकि बाद में मेल मिलाप या सुलह की सूरत में 'रजअत' या सिर्फ निकाह ही से काम चल जाए। वरना तीन तलाक की सूरत में हलाला' की ज़रूरत पड़ती है, जो औरत व मर्द दोनों के लिए बाइसे हतक(रूसवाई) होता है।*_

_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 74/75*_                  

_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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