बीवी से जुदा रहने की मुद्दत 44

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 044*

                 *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*

                 _*बीवी से जुदा रहने की मुद्दत*_

_*💫मर्द को चाहिये कि कम से कम चार माह में एक बार अपनी बीवी से सोहबत ज़रूर करे, बिला वजह औरत को छोड़ कर बहुत दिन सफ़र में न रहे। जो लोग शादी करके बीवी से अलग थलग रहते हैं । और औरत के साथ उसके बिस्तर का हक़ अदा नहीं करते, वे हक्कुल इबाद में गिरफ्तार और बहुत बड़े गुनाहगार हैं। अगर शौहर किसी मजबूरी से अपनी औरत के उस हक़ को अदा न कर सके तो शौहर पर लाजिम है कि औरत से उसके इस हक़ को माफ़ कराये। औरत के इस हक़ की कितनी अहमियत है, इस बारे में हज़रत अमीरूल मोमिनान उमर फारूक रदियल्लाहु तआला अन्हु का एक वाकिआ बहुत ज़्यादा इबरतनाक और नसीहत आमेज़ है।*_

_*✨एक मर्तबा रात के वक़्त हस्बे मअमूल हज़रत फारूके आज़म रदियल्लाहु अन्हु रिआया(Public) की खबरगीरी के लिये शहरे मदीना में गश्त फ़रमा रहे थे कि अचानक एक मकान से दर्दनाक अश्आर पढ़ने की आवाज़ सुनी। आप उसी जगह खड़े हो गए और गौर से सुन्ने लगे तो एक औरत दर्द भरे लहजे में कुछ अश्आर पढ़ रही थी जिनका मफ़्हूम यह है "खुदा की कसम! अगर खुदा के अज़ाब का खौफ़ न होता तो बिला शुबाह इस चारपाई के किनारे जुम्बिश में हो जाते"। अमीरूल मोमिनीन ने सुबह को जब तहकीकात की तो मालूम हुआ कि इस औरत का शौहर जिहाद के सिलसिले में कई माह से बाहर गया हुआ है और यह औरत उसको याद कर के फ़िराक के गम में ये अश्आर पढ़ रही है। अमीरूल मोमिनीन के दिल पर इसका इतना गहरा असर पड़ा कि सुबह ही को उसके शौहर की तलब के लिये कासिद रवाना कर दिया। इसके बाद आप अपनी साहिबज़ादी हज़रत हफ़्सा रदियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ़ ले गए और उनसे फ़रमाया मुझे एक मुश्किल मसअला दरपेश है, तुम उसको हल कर दो। मसअला यह है "औरत बगैर मर्द के कितने दिन सब्र कर सकती है?'' उन्होंने जवाब दिया “तीन माह या ज़्यादा से ज़्यादा चार माह" वहाँ से वापस आकर आपने तमाम सिपह सालारों को यह फ़रमान लिख भेजा "कोई शादी शुदा फ़ौजी चार माह से ज़्यादा अपनी बीवी से जुदा न रहे"।*_

_*औरत को छोड़ कर सफ़र में जाना या किसी मुलाज़िमत में जाना अगर ज़रूरत से हो तो जाइज़ है, इसकी कोई हद नहीं। अलबत्ता बेज़रूरत चार माह से ज़ाइद जुदा रहना मना है।*_

_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 58/59*_                          

_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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