हालते हैज़ में औरत अछूत नहीं*_40

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 040*
                 
                 *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*

               _*हालते हैज़ में औरत अछूत नहीं*_

_*✨कुछ मज़हबों में औरत को हालते हैज़ में ऐसा नापाक और अछूत समझा जाता है कि उनके साथ खाना, पीना या उनके हाथ से खाना पीना, बोसो-किनार करना वगैरह सब काबिले नफ़रत समझते हैं। यहाँ तक कि उनके साथ उठना-बैठना भी छोड़ देते हैं। ये सब लग्व,बेहूदा और जिहालत की बातें हैं। इस्लाम एतिदाल का हुक्म देता है। औरत हालते हैज़ में ऐसी नापाक नहीं हो जाती कि उसके साथ खाना-पीना, उठना-बैठना भी हराम हो जाय। बल्कि औरत हालते हैज़ में फ़ातिहा वगैरह का खाना भी बना सकती है। जो लोग औरतों को हालते हैज़ में अछूत समझते हैं, वे निरे जिहालत में हैं। मुशरिकों और यहूदियों की पैरवी करते हैं।*_

_*💫सरकार मुफ़्ती-ए-आज़म हिन्द अपने एक फ़तवे में लिखते हैं: "जो लोग ऐसा करते हैं, वे नाजाइजो गुनाह का काम करते हैं और मुश्रिकीन, यहूद और मजूस की पैरवी करते हैं। हालते हैज़ में सिर्फ सोहबत (नाफ़ से लेकर घुटने तक, इस दरमियान से फायदा हासिल करना) नाजायज़ है। बस इससे परहेज़ ज़रूरी है। मुश्रिकीनो यहूद और मजूस की तरह हैज़ वाली औरत को भंगन से भी बदतर समझना बहुत नापाक ख्याल, निरा जुल्म, अज़ीम वबाल है, यह उनकी मनघड़त है।"*_

_*📖मसअलाः- नाफ़ से ऊपर और घुटने से नीचे किसी तरह नफअ लेने के कोई हरज नहीं। यहाँ तक कि बोसो किनार भी जाइज़ है। इसी तरह अपने साथ खिलाना या एक जगह सोना जाइज़ है, बल्कि इस वजह से साथ न सोना मकरूह है।*_

_*📖मसअलाः- अगर साथ सोने में गल्ब-ए-शहवत और अपने को काबू में न रखने का एहतिमाल हो तो साथ न सोए और अगर गुमाने ग़ालिब हो तो साथ सोना गुनाह।*_

_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 55/56*_
           
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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