हालते हैज़ में मुबाशरत हराम है। 37
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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_
*✍️ पोस्ट न. 037*
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*
_*हालते हैज़ में मुबाशरत हराम है।*_
_*💫कुर्आन ए करीम में - अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: "तो औरतों से अलग रहो हैज़ के दिनों और उनसे नज़्दीकी न करो जब तक पाक न हो लें, फिर जब पाक हो जायें तो उनके पास जाओ जहाँ से तुम्हे अल्लाह ने हुक्म दिया।"*_
_*📖मसअलाः- हालते हैज़ में हमबिस्तरी को जाइज़ जानना कुफ्र है और हराम समझ कर किया तो सख्त गुनाहगार हुआ, उस पर तौबा फ़र्ज़ है। बअज़ फुकहा(उलमा) ने इस हुक्म की ख़िलाफ़ वर्जी पर हदीस के मुताबिक कफ़्फ़ारा भी रखा है। अगरचे हमारे इमामे आज़म के नज़्दीक कफ्फारा अदा करना वाजिब नहीं, तौबा व इस्तिग़फ़ार वाजिब है। जिस आदमी से ग़ल्ब ए शहवत की बिना पर हालते हैज़ में हमबिस्तरी का गुनाह सर्ज़द हो जाए तो उसे एक दीनार या निस्फ़ दीनार बतौरे कफ्फारा सदका करना चाहिये। अगर आमद के ज़माने में किया तो एक दीनार और कुर्बे ख़त्म के किया तो निस्फ़ दीनार सदक़ा करना मुस्तहब है।*_
_*📖मसअलाः- औरत हैज़ की हालत में है और मर्द को शहवत का ज़ोर है और डर यह है कि कहीं ज़िना में न फंस जाए तो ऐसी हालत में औरत के पेट पर ज़कर को मस करके इन्जाल करे तो जाइज़ है, रान पर नाजाइज़ है। हालते हैजो निफ़ास में नाफ़ के नीचे से ज़ानू तक औरत के बदन से बिला किसी हायल के फ़ायदा हासिल करना जाइज़ नहीं।*_
_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 53*_
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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