*✨तरीका-ए-जिमाअ✨*27

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 027*                

                 *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*

                       *✨तरीका-ए-जिमाअ✨*
                                *{पार्ट 3⃣ }*

_*✨औरत के बैठी हुई हालत में मुक़ारबत ( संगत ) न करे , इसी तरह पहलू की तरफ़ से भी न करे कि इससे दर्दे कमर पैदा होता है । औरत को अपने ऊपर भी न चढ़ाये कि इससे औरत बाँझ हो जाती है बल्कि औरत को चित लिटाए और उसकी टाँगो को ऊपर उठाए ।*_

_*💫शैख़ बू अली सीना के नज़दीक जिमाअ की तमाम शक्लों में बुरी शक्ल यह है कि औरत मर्द के ऊपर हो और मर्द नीचे चित लेटा हो क्योंकि इस सूरत में मनी मर्द के उज़्व में बाकी रह कर मुतअफ़्फ़न हो जाती है जो तकलीफ़ का बाइस होती है । इन्ज़ाल के बाद फ़ौरन जुदा न हो बल्कि इन्तिज़ार करे कि औरत की भी हाजत पूरी हो जाए ।*_

_*✨इमाम गज़ाली फ़रमाते हैं कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया " मर्द में यह कमज़ोरी की निशानी है कि जब मुबाशरत ( संगत ) का इरादा करे तो बोसो किनार से पहले जिमाअ़् करने लगे और जब इन्जाल हो जाय तो सब्र न कर सके और फौरन अलग हो जाय कि औरत की हाजत अभी पूरी नहीं हो पाई है । "*_

_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 45*_
           
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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