जिमाअ़् के आदाब 23

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_*🥀सलिक़ -ए- ज़िन्दगी 🥀*_



                             *✍️ पोस्ट न. 023*

                 *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला*

                   _*🌹जिमाअ़् के आदाब🌹*_

_*✨जिमाअ करना इन्सान की वह तबई और अहम ज़रूरत है जिसक बगैर इन्सान का सही तौर से ज़िन्दगी गुज़ारना मुश्किल बल्कि तकरीबन ना मुम्किन सा है। अल्लाह तआला ने जिमाअ़् की ख़्वाहिर इन्सानों ही में नहीं बल्कि तमाम हैवानात में वदीअ़त रखी है लेकिन शरीअत ने इन्सान की इस फ़ितरी ख्वाहिश की तक्मील के लिये कुछ आदाब और तरीके मुकर्रर कर दिये ताकि इन्सान और हैवान में फर्क हो जाए। अगर जिमाअ़् का मकसद सिर्फ शहवत की तकमील होता ख्वाह जिस तरह भी हो तो इन्सान और हैवान में फर्क ही न होता। इसलिये इसके आदाब की रिआयत शीरअी हक होने के साथ-साथ इन्सानी हक़ भी है। कुरान- अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:*_

_*"तो अब उनसे सोहबत करो और तलब करो जो अल्लाह तुम्हारे नसीब में लिखा हो।*_
_*📚 (सुरह बकरा)*_

_*हदीस - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया तुम में से जो कोई अपनी बीवी के पास जाए तो पर्दा करे और गधों की तरह बरहना(नंगा) न हो जाए।*_

_*📚(इब्ने माजा पेज 138)*_
_*📚सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 40/41*_
           
_*🧮 जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_



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